लेखक के विषय में

नारायणी मित्तल, संग्रहकर्ता

धन्यवाद! मेरे प्रभु से इस प्यारे जीवन के लिए, सुमति और अच्छे विचारों से अवगत कराने के लिए। मेरा परम सौभाग्य है कि लोकगीतों का संग्रह करने की भावनाये जागी। हम सभी जानते हैं कि लोकगीतों के रचनाकार और रचनाकाल दोनों से ही हम परिचित नहीं हो पाते। कारण यह है कि लोकगीत सामान्यतः अनपढ़ और रूढि़यों से बंधे किसी एक व्यक्ति की कृति नहीं होते वरन् वे समय-समय पर परिवर्तित होते रहते हैं तथा अनाम रचनाकारों की सामुहिक रचना होते हैं। यों तो एक संस्कार के समय गाने के लिए हजारों गीत होते हैं जिनको पढ़कर, गाकर उस समय के प्रत्येक रीति-रिवाज का पता चल जाता है।

सच कहूँ तो इस पुस्तक हेतु आवश्यक पठन सामग्री जुटा पाना मुझे पहले-पहल एक दुष्कर कार्य प्रतीत हुआ मगर घीरे-घीरे परिवार जनो व सगे-सम्बन्घियो का सहयोग मिलता गया, लेखन मार्ग प्रशस्त होता चला गया।
मुझे यह स्वीकारने मे कोई गुरेज़ नहीं कि इस पुस्तक के माध्यम से मेरा निज प्रयास यही रहा कि मैं अपनी विरासत को आने वाली पीढ़ियो के कर-कमलो मे पुस्तक के रुप मे सौप सकूँ ताकि वे भी हमारे पूजनीय देवी-देवताअो, वैवाहिक तथा अन्य मांगलिक अवसरो पर गाए जाने वाले गीतो आदि से भली भांति परिचित हो तथा इनका पूरा आनन्द उठा सकें। और हाँ, इस पुस्तक मे समाहित गीतो का आनन्द संगीतबद्ध रूप मे उपलब्घ सीडी/नोट पर भी उठाया जा सकता है।
मेरा शैंक्षणिक स्तर औसत दज्रे का रहा, और जो पठन-पाठन की रूचि थी भी तो वह धार्मिक पुस्तको तक ही सीमित थी। ऐसे मे, यह पुस्तक मेरे लिए गर्व का विषय है और अब आपको समर्पित है।
अनुरोघ है कि इस पुस्तक के विषय मे अपनी रूचि, पसन्द आदि के विषय मे अवश्य अवगत कराएँ।

घन्यवाद।
नारायणी मित्तल